मंगलवार, 7 अक्तूबर 2008

ज़ुल्म की शिद्द्त


बढ़ा दो ज़ुल्म की शिद्द्त बढ़ा दो,

बहुत दिन हो गए रोया नही हूँ।

सिरहाने मौत का तकिया लगा दो,

कई रातों से मैं सोया नही हूँ ।

3 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

सर,पंक्तियाँ बहुत ही मर्मस्पर्शी थीँ।
आपको इतना गहरा ज़ख़्म कहाँ से मिला सर?
ये पंक्तियाँ याद आ गईँ ,शायद आपके ही मुँह से सुना था-
जो कोई पूछता है मुझसे कि आँखेँ सुर्ख़ क्योँ है,मैँ आँखेँ मल के कहता हूँ कि रात सो न सका।
हज़ार चाहूँ लेकिन ये कभी कह नहीँ सकता ,कि रात ख़्वाहिश थी रोने कि लेकिन रो न सका॥

राहुल शर्मा ने कहा…

सर,पंक्तियाँ बहुत ही मर्मस्पर्शी थीँ।
आपको इतना गहरा ज़ख़्म कहाँ से मिला सर?
ये पंक्तियाँ याद आ गईँ ,शायद आपके ही मुँह से सुना था-
जो कोई पूछता है मुझसे कि आँखेँ सुर्ख़ क्योँ है,मैँ आँखेँ मल के कहता हूँ कि रात सो न सका।
हज़ार चाहूँ लेकिन ये कभी कह नहीँ सकता ,कि रात ख़्वाहिश थी रोने कि लेकिन रो न सका॥

राहुल शर्मा ने कहा…

सर,पंक्तियाँ बहुत ही मर्मस्पर्शी थीँ।
आपको इतना गहरा ज़ख़्म कहाँ से मिला सर?
ये पंक्तियाँ याद आ गईँ ,शायद आपके ही मुँह से सुना था-
जो कोई पूछता है मुझसे कि आँखेँ सुर्ख़ क्योँ है,मैँ आँखेँ मल के कहता हूँ कि रात सो न सका।
हज़ार चाहूँ लेकिन ये कभी कह नहीँ सकता ,कि रात ख़्वाहिश थी रोने कि लेकिन रो न सका॥

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