सोमवार, 23 नवंबर 2009

मैं क्या करूं


कितना बदल गया है ज़माना मैं क्या करूं,
मुश्किल हुआ है दिल का लगाना मैं क्या करूं

माना के रास्ते में बड़ी भीड़ है मगर,
आता नही है अपना बनाना मैं क्या करूं

जाएं कहाँ पे किसको सुनाएं ये दास्तान,
सुनता नही है कोई फ़साना मैं क्या करूं

चेहरे को अपने रोज़ बदलते हैं सब यहाँ,
आता नही है कोई बहाना मैं क्या करूं

नज़रों के सामने कभी आजाएं वो अगर,
'अनवार' तुम ही मुझको बताना मैं क्या करूं

3 टिप्‍पणियां:

amrendra "aks" ने कहा…

"जाएं कहाँ पे किसको सुनाएं ये दास्तान,
सुनता नही है कोई फ़साना मैं क्या करूं।"

kya khoob likha hai sir ye duniya aisi hi hai kisi ki nahi sunti ............sab apni mauj me jeete hai............thanx

aania sweet ने कहा…

chehre ko apne roz badalte hain sab yahan......" Bikne laga hai zameer yahan iss qadar.....main kya karoon......????? "

bahot achcha likha hai aapne..., ek line humne apni taraf se jod di.., Please Don't mind......!!! :)

Mukesh 'nadan' ने कहा…

Bahut dino baad haqiqat likhi hai janab, yeh batao .........................kab doge walime ka khana mai kya karoon,........salamwalekum

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