शनिवार, 23 मई 2009

परछाइयों का डर



बेनाम पुकारूँ तो कभी तेरे नाम से,


तुझको पुकारता हूँ मैं हर इक मुक़ाम से।


अशको के साथ साथ मेरे ग़म छलक गए,


रखा था अपने दिल में बड़े एहतराम से,


परछाइयों से भी मुझे लगने लगा है डर,


मैंने बुझा दिया है चिरागों को शाम से।


होठों पे तबस्सुम मगर दिल में मैल था,


करते रहे फरेब बड़े एहतिमाम से।


'अनवार' हमको ऐसी बहारें भी कुछ मिलीं,


घबरा गया हूँ आज बहारों के नाम से।





3 टिप्‍पणियां:

Rohit "meet" ने कहा…

परछाइयों से भी मुझे लगने लगा है डर,
मैंने बुझा दिया है चिरागों को शाम से।
wah wah bhAI jawab nahi aapka

Rohit "meet" ने कहा…

ye wala ghar kabhi dikhya nahi aapne jo aapne pic lagayi hai.

अनवारुल हसन [VOICE PRODUCTION] ने कहा…

ROHIT JI AAP KABHI TANHAEYON KE ANDHERON MEIN HAMARE GHAR NAHI AAYE...

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