
बुधवार, 5 नवंबर 2008
नया कारोबार
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दिल में मज़ार

इश्क की यादगार है भाई,
दिल मेरा दाग़दार है भाई,
उसने रिश्ते पे डाल दी मिट्टी,
मेरे दिल में मज़ार है भाई।
पूरी क़ीमत लगाइए अपनी,
अब यही कारोबार है भाई।
मंगलवार, 21 अक्टूबर 2008
मेरे आंसू
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तन्हाई की आदत
हमें तन्हाइयों की आदत है,
हमको महफिल में मत बुला लेना।
याद आ जाएं जब मेरे आंसू ,
देखो पल भर को मुस्कुरा देना।
हमको महफिल में मत बुला लेना।
याद आ जाएं जब मेरे आंसू ,
देखो पल भर को मुस्कुरा देना।
बुधवार, 8 अक्टूबर 2008
प्रतिक्रिया
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मेरा ख्याल है...
राहुल भाई आप ही की तरह अन्य मित्र भी मेरे दर्द की वजह पूछते हैं , मुझे लगता है की जो लोग रिश्तों को बचाए रखने में सारी उम्र लगा देते हैं अक्सर उन्हें ऐसे ही ज़ख्मों से दो -चार होना पड़ता है हाँ ये और बात है के आसानी से ये ज़ख्म दुनिया के सामने अयाँ नही होते , कृष्ण बिहारी नूर साहब के शब्दों में:-
तमाम जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था,
कोई न जान सका रखरखाव ऐसा था।
=अनवारुल हसन
तमाम जिस्म ही घायल था घाव ऐसा था,
कोई न जान सका रखरखाव ऐसा था।
=अनवारुल हसन
मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008
ज़ुल्म की शिद्द्त

बढ़ा दो ज़ुल्म की शिद्द्त बढ़ा दो,
बहुत दिन हो गए रोया नही हूँ।
सिरहाने मौत का तकिया लगा दो,
कई रातों से मैं सोया नही हूँ ।
रविवार, 7 सितंबर 2008
नींद नहीं आती है…
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यादों की चिलमन से...

अनजाने अनचीन्हे रस्ते पे चलती है,
जैसे फ़िज़ाओं में तितली मचलती है।
यादों की चिलमन सी गिरती संभलती है,
अँधियारा होते ही दीपक सा जलती है।
तारों के झुरमुट में रस्ते बनाती है,
गीतों और गज़लों के मुखड़े सजाती है।
जीवन का राग मेरे साथ-साथ गाती है,
दूर कहीं छुप-छुप के पायल खनकाती है।
वादा है उसका मैं सपनो में आऊँगी,
प्रीतम का सूना घर आँगन सजाऊँगी।
देहरी पे खुशियों के दीपक जलाऊंगी,
रेशम की चमकीली माला बन जाऊंगी।
चाहत है सच्ची तो फिर क्यों ये दूरी है ?
लगता है तुम बिन ये ज़िन्दगी अधूरी है।
साजन से मिलना है ऐसी मजबूरी है ,
सपनों की खातिर तो सोना ज़रूरी है।
जैसे फ़िज़ाओं में तितली मचलती है।
यादों की चिलमन सी गिरती संभलती है,
अँधियारा होते ही दीपक सा जलती है।
तारों के झुरमुट में रस्ते बनाती है,
गीतों और गज़लों के मुखड़े सजाती है।
जीवन का राग मेरे साथ-साथ गाती है,
दूर कहीं छुप-छुप के पायल खनकाती है।
वादा है उसका मैं सपनो में आऊँगी,
प्रीतम का सूना घर आँगन सजाऊँगी।
देहरी पे खुशियों के दीपक जलाऊंगी,
रेशम की चमकीली माला बन जाऊंगी।
चाहत है सच्ची तो फिर क्यों ये दूरी है ?
लगता है तुम बिन ये ज़िन्दगी अधूरी है।
साजन से मिलना है ऐसी मजबूरी है ,
सपनों की खातिर तो सोना ज़रूरी है।
रात बड़ी बैरन है मुझको सताती है ,
ख़्वाबों की डोली को दूर लिए जाती है।
नैनों के आँचल से निंदिया चुराती है,
नींद नहीं आती है, नींद नहीं आती है...
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शुक्रवार, 25 जुलाई 2008
टूट गयीं चूडियाँ
अपने पिता के निधन के बाद मैंने अपनी माँ की टूटी हुई चूडियों की एक घटना अपनी बहिन वर्षा दीपक जी को बताई थी। उन्होंने मेरे दर्द को महसूस किया और कुछ दिन बाद ये कविता लिख कर मुझे दी। इस घटना से मैंने यह जाना के परम्पराओं की डोर कितनी मज़बूत होती है। _अनवारुल हसन
खनकती कलाई माँ की, चूडियाँ हरी-भरी
मुस्कान गुलाबी लगती थी कितनी भली।
काली घटा में एक दिन, घटना ऐसी घट गयी
ढूँढा बहुत हँसी को पर जाने कहाँ सिमट गयी।
खो गए कहकहे, उमड़ी भीड़ इधर-उधर
फुसफुसाते लोगों के बीच, घुलने लगा अजब ज़हर।
फ़र्श पर कांच बिखरे, ले रहे थे अन्तिम साँस
रंग-बिरंगे सपने टूटे, चुभो दी गयी जबरन फाँस।
पापा लाते थे चूडियाँ, लगता था जब मेला
एक मेला लगा घर में , बदले माँ का चोला
बदली समय ने चाल, पर बदले नहीं रिवाज
हरी चूडियाँ छीन, घाव हरे कर रहा समाज।
देती नहीं सुनाई अब, रुनझुन वाली पदचाप।
ओढ़ उदासी, माँ दिखती है चुपचाप।
रंग गए पापा संग, माँ रहे यादों के साथ
छिप-छिप रोए, देखे बेटी माँ के नंगे हाथ।
_वर्षा दीपक दिवेदी
मंगलवार, 15 जुलाई 2008
ग़रीबी में ऐश

एक अमीर लड़की को स्कूल में ग़रीब परिवार पर निबंध लिखने को कहा गया
ESSAY : एक ग़रीब परिवार था, पिता ग़रीब, माँ ग़रीब, बच्चे ग़रीब। परिवार में 4 नौकर थे, वह भी ग़रीब। कार भी टूटी हुई SCORPIO थी। उनका ग़रीब ड्राईवर बच्चों को उसी टूटी कार में स्कूल छोड़ के आता था। बच्चों के पास पुराने मोबाइल थे। बच्चे हफ्ते में सिर्फ 3 बार ही होटल में खाते थे। घर में केवल 4 सेकंड हैण्ड एसी थे। सारा परिवार बड़ी मुश्किल से ऐश कर रहा था.!
ESSAY : एक ग़रीब परिवार था, पिता ग़रीब, माँ ग़रीब, बच्चे ग़रीब। परिवार में 4 नौकर थे, वह भी ग़रीब। कार भी टूटी हुई SCORPIO थी। उनका ग़रीब ड्राईवर बच्चों को उसी टूटी कार में स्कूल छोड़ के आता था। बच्चों के पास पुराने मोबाइल थे। बच्चे हफ्ते में सिर्फ 3 बार ही होटल में खाते थे। घर में केवल 4 सेकंड हैण्ड एसी थे। सारा परिवार बड़ी मुश्किल से ऐश कर रहा था.!
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