सोमवार, 25 जनवरी 2010

गणतंत्र का दीया


अब तो ये भी याद नहीं है कितनी बार ये आँखें रोई,
इन
बीते सालों में हमने ख़ुद ही अपनी लाशें ढोई.

... लेकिन उम्मीद कभी नहीं मरती...
अगर
हम ईमानदारी से अपनी ज़िम्मेदारी निभाएंगे
...तो हालात बदल जाएंगे...
...HAPPY REPUBLIC DAY

बुधवार, 13 जनवरी 2010

यादों की अलमारी



मैंने कभी सजा कर समेट कर नहीं रखा

यादों को तहा कर लपेट कर नहीं रखा।

इन्हे बेतरतीब अलमारी में भरता चला गया

मेरी ज़िन्दगी का कमरा बिखरता चला गया।

ज़हन का पट खुलते ही बेतहाशा बिखर गयी यादें

मुझे मुंह चिढा रहे हैं टूटे वादे और भूली बिसरी बातें।

अपने आप में गुंथ कर उलझ गयी है एक एक याद

छोर नहीं मिल रहा इसलिए सुलझ नहीं रही कोइ बात।

इधर कोइ नहीं आता किस से करुँ फ़रियाद

बंद कमरे में घुट जायेगी फिर मेरी आवाज़।

बिखरी हुई कुछ यादें अभी भी सो रही हैं,

उनीदी पलकों पर कुछ ख़्वाब संजो रही हैं ।

हाथ लगाने पर ये चिल्लाएंगी चीख़ उठेगीं

अभी तो बस धीरे धीरे ही रो रहीं हैं ।

मन बहलाने को ये यादें कोई कहानी माँगेगी

टूटे जुडते रिश्तों की फिर कोई निशानी मांगेंगी

जाने कितनी सदियों से ये प्यासी हैं

मुझे पता है ये मेरी आखों से पानी मांगेंगी।

गुरुवार, 31 दिसंबर 2009

नव वर्ष मंगलमय हो

गुरुवार, 10 दिसंबर 2009

कोई तो इधर आए


इस बंद हवेली में दम मेरा न घुट जाए,
पलकों को बिछाए हूँ कोई तो इधर आए।

सुनसान अंधेरे में घबराएगा दिल मेरा,
डरता हूँ कहीं सूरज सोने न चला जाए।


अपने सभी ज़ख्मों को मैं दिल में छुपा लूँगा,
कोशिश है के आंखों से आंसू न छलक जाए।

चौराहे पे आ कर अब मंजिल ही नही मिलती,
रस्ता भी नही मालूम जायें तो कहाँ जायें।

'अनवार' अकेले में मांगी है दुआ रब से,
घंघहोर अंधेरों तक कोई तो किरण आए।

सोमवार, 23 नवंबर 2009

मैं क्या करूं


कितना बदल गया है ज़माना मैं क्या करूं,
मुश्किल हुआ है दिल का लगाना मैं क्या करूं।

माना के रास्ते में बड़ी भीड़ है मगर,
आता नही है अपना बनाना मैं क्या करूं।

जाएं कहाँ पे किसको सुनाएं ये दास्तान,
सुनता नही है कोई फ़साना मैं क्या करूं।

चेहरे को अपने रोज़ बदलते हैं सब यहाँ,
आता नही है कोई बहाना मैं क्या करूं।

नज़रों के सामने कभी आजाएं वो अगर,
'अनवार' तुम ही मुझको बताना मैं क्या करूं ।

गुरुवार, 3 सितंबर 2009

तुम कौन हो???



तुम कौन तुम्हें किसने भेजा,


क्यों मुझे सहारा देते हो


मेरी आंखों का हर आंसू,


अपनी आंखों में लेते हो


मैं तुमको अपना क्या मानूं ,


अभिशाप हो या वरदान हो तुम?


तनहाई में अक्सर रो रो कर,


तुम मेरा नाम क्यों लेते हो ???

शनिवार, 29 अगस्त 2009

दोस्त का गिफ़्ट


कैसे भेजूं ए मेरे दोस्त बता फूल तुझे,

जबकि कांटे ही चुभाये हों ज़माने ने मुझे।
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