शनिवार, 30 मई 2009

मुबारक है मुझे

रौशनी ले लो नाबीनाई मुबारक है मुझे,

हर तरफ़ मेरे तमाशाई मुबारक है मुझे।


है दुआ महफिल में तेरी रौनक़े आबाद हों,


ये अकेलापन ये तनहाई मुबारक है मुझे।

शनिवार, 23 मई 2009

परछाइयों का डर



बेनाम पुकारूँ तो कभी तेरे नाम से,


तुझको पुकारता हूँ मैं हर इक मुक़ाम से।


अशको के साथ साथ मेरे ग़म छलक गए,


रखा था अपने दिल में बड़े एहतराम से,


परछाइयों से भी मुझे लगने लगा है डर,


मैंने बुझा दिया है चिरागों को शाम से।


होठों पे तबस्सुम मगर दिल में मैल था,


करते रहे फरेब बड़े एहतिमाम से।


'अनवार' हमको ऐसी बहारें भी कुछ मिलीं,


घबरा गया हूँ आज बहारों के नाम से।





गुरुवार, 7 मई 2009

मैं हूँ एक दिया




मैं हूँ जलता हुआ राह का एक दिया,


जिसने लोगों की राहों को रोशन किया।


बदनसीबी मगर मुझको इतनी मिली,


मुझको अपनी कभी रौशनी न मिली।


शनिवार, 11 अप्रैल 2009

मकान की समस्या और गन्दा नाला


बहुत दिन से थे परेशान

ढूंढ रहे थे एक मकान

प्रोपर्टी डीलर ने किया एहसान

दिखाया एक मकान

मकान था बेहद आलीशान

यों लगा जैसे मिल गया समाधान

समस्या हो गयी आसान

पर तभी दिखा एक गड़बड़झाला

मकान से सट कर बह रहा था गन्दा नाला

नाला देख कर छोटा भाई बिदक गया

हमारा भी मन कुछ - कुछ हिचक गया

हमने आँखें मूँद कर अपने विचार्रों को कूटा

और तभी अन्दर से एक आईडिया फूटा

मैंने कहा अब ज़्यादा न सोचो भाईजान

मकान में घुस जाओ लेकर अपना सामान

कुछ समय बाद गहराएगा जल संकट

हल हो जाएगा अपना झंझट

नाला अपने आप ख़तम हो जाएगा

अरे! जब पीने को ही पानी न होगा

तो नाले में कौन बहाएगा



गुरुवार, 2 अप्रैल 2009

मोहब्बत के ग़म




कभी थोड़े ज़्यादा कभी कम मिले हैं


हमें इस मोहब्बत में बस ग़म मिले हैं


इन्हें तुम उठा कर फ़लक़ पर सजा दो


मेरी आँख से जितने शबनम गिरे हैं


अपूर्ण.......

बुधवार, 18 मार्च 2009

इश्क़ का तूफ़ान


शोख़ चंचल ज़िन्दगी की हर निशानी ले गया,
कौन था वो जो मेरी सुबहें सुहानी ले गया।

उसके जाते ही मेरी बेनूर आँखें हो गईं ,
मेरी आंखों से छलकता पानी - पानी ले गया

ज़िन्दगी धुंधला गयी हर वर्क कोरा रह गया,
जीस्त के पन्नों पे लिखी हर कहानी ले गया।

इक मुसलसल शाम ही अब मेरे अफ़साने में है,
इश्क का तूफ़ान दरिया की रवानी ले गया।

अब कहीं अनवार तेरा कुछ पता मिलता नही,
हर गली रस्ते से कोई सब निशानी ले गया।

शनिवार, 6 दिसंबर 2008

इंसान का चेहरा!


उसे कोई भी शै हंसती हुई अच्छी नही लगती,
वो फूलों के लबों से मुस्कुराना छीन लेता है।
घने जंगल इसी की ज़द में आ कर शहर बनते हैं,
ये इन्सां तो परिंदों का ठिकाना छीन लेता है।

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