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शुक्रवार, 19 मार्च 2010

कभी-कभी चेहरे पर नक़ाब तुम रखो


आसमाँ को छूने का,भले ख़्वाब तुम रखो
मगर ज़मीं से भी नाता,लाजवाब तुम रखो,
तुम्हारी कोशिशें भी,एक दिन रंग लायेंगी
बस अपने दिल में हौसले,बेहिसाब तुम रखो।
बुज़ुर्गों की भी हालत पे, ज़रा ग़ौर फ़रमाना
ख़यालों में अपना जब भी,शबाब तुम रखो।
कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।
उजाले के लिए तो एक दीपक,बहुत होता है
क्या फ़ायदा ग्रहण लगा, आफ़ताब तुम रखो।
हर इंसान में गौतम औ'ग़ाज़ी, नज़र आयेंगे
नज़रिया अपना बस,ना ख़राब तुम रखो।
आज के दौर में ये भी ज़रूरी,हो गया'राहुल'
कि कभी-कभी चेहरे पर नक़ाब तुम रखो।

8 टिप्पणियाँ:

सुशीला पुरी ने कहा…

दम है .........

अनवारुल हसन [VOICE PRODUCTION] ने कहा…

कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।

और ज़रूरी ये भी नहीं की जवाब होने के बावजूद हर सवाल का जवाब दिया जाये...
बेहतरीन सोच को आकार देने के लिए बधाई!

राहुल शर्मा ने कहा…

उत्साहवर्धन के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद सर,
बिल्कुल सही कहा आपने .....जवाबों के होते हुए भी जवाब दिया ही जाए ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है....

nadankinadani ने कहा…

kalam tod kar shabdo ko piroya hai
ish josh ko mehfooj janab tum rakho.

bahut umda likha hai rahul bhai, yunhi kalam ki roshni bikherte rahiye

Mukesh Nadan
www.mksheetal.blogspot.com

अल्पना वर्मा ने कहा…

कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।

***बेहतरीन !

Rohit "meet" ने कहा…

wah kya baat hai badiya ....

mridula pradhan ने कहा…

bahot achche.

स्वाति ने कहा…

कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।

बहुत ही अच्छी लगी आपकी ये पंक्तिया

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