
आसमाँ को छूने का,भले ख़्वाब तुम रखो
मगर ज़मीं से भी नाता,लाजवाब तुम रखो,
तुम्हारी कोशिशें भी,एक दिन रंग लायेंगी
बस अपने दिल में हौसले,बेहिसाब तुम रखो।
बुज़ुर्गों की भी हालत पे, ज़रा ग़ौर फ़रमाना
ख़यालों में अपना जब भी,शबाब तुम रखो।
कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।
उजाले के लिए तो एक दीपक,बहुत होता है
क्या फ़ायदा ग्रहण लगा, आफ़ताब तुम रखो।
हर इंसान में गौतम औ'ग़ाज़ी, नज़र आयेंगे
नज़रिया अपना बस,ना ख़राब तुम रखो।
आज के दौर में ये भी ज़रूरी,हो गया'राहुल'
कि कभी-कभी चेहरे पर नक़ाब तुम रखो।



8 टिप्पणियाँ:
दम है .........
कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।
और ज़रूरी ये भी नहीं की जवाब होने के बावजूद हर सवाल का जवाब दिया जाये...
बेहतरीन सोच को आकार देने के लिए बधाई!
उत्साहवर्धन के लिए कोटि-कोटि धन्यवाद सर,
बिल्कुल सही कहा आपने .....जवाबों के होते हुए भी जवाब दिया ही जाए ये बिल्कुल ज़रूरी नहीं है....
kalam tod kar shabdo ko piroya hai
ish josh ko mehfooj janab tum rakho.
bahut umda likha hai rahul bhai, yunhi kalam ki roshni bikherte rahiye
Mukesh Nadan
www.mksheetal.blogspot.com
कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।
***बेहतरीन !
wah kya baat hai badiya ....
bahot achche.
कुछ सवालों को तुम,अनसुना भी कर देना
ज़रूरी नहीं कि सबका, जवाब तुम रखो।
बहुत ही अच्छी लगी आपकी ये पंक्तिया
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